Thursday, 2 January 2020

राजस्थान में हर साल 60 हजार नवजात तोड़ रहे दम

Health news IN HINDI : हर साल करोड़ों रुपए का बजट, नेताओं के दावे, सरकारों के वादे फिर भी प्रदेश में हर 60 हजार नवजातों की मौत, ( Kota jk lon hospital ) जी हां कोटा के जेके लोन अस्पताल में 48 घंटे में 10 शिशुओं की मौत के मामले में राज्य सरकार की कमेटी ने भले ही कुछ कारण गिना दिए हों लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रदेश भर में गंभीर शिशुओं का उपचार करने वाले संसाधन जरूरत के मुताबिक हैं ही नहीं। यह स्थिति भी तब है, जब देश में शिशु मृत्यु दर के मामले में राजस्थान सबसे खराब स्थिति वाले निचले पांच राज्यों में शामिल है। राजस्थान में हर साल जन्म लेने
के बाद लगभग 60 हजार नवजात दम तोड़ रहे हैं। सरकार की कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद पत्रिका ने कारणों की पड़ताल की तो सामने आया कि कोटा ही नहीं बल्कि जयपुर के सबसे बड़े जेके लोन अस्पताल सहित अन्य अस्पतालों में मरीजों का भारी दबाव है। इसकी तुलना में संसाधनों की भारी कमी है। प्रदेश में प्रतिवर्ष औसतन 17 लाख जीवित शिशु जन्म लेते हैं।

कोटा में शिशुओं की मौतों के बाद कांग्रेस जहां शिशु मृत्यु दर घटने का दावा कर खुद की पीठ थपथपा रही है, वहीं भाजपा भी इस मामले में जांच कमेटियां बनाकर अनजान बन रही है। जबकि वास्तविकता यह है कि कोई भी सरकार ऐसा ए€शन प्लान नहीं बना पाई, जिससे राजस्थान निचले पांच राज्यों के बजाय ऊपर के पांच राज्यों में जगह पा सके।

इन सुधारों की जरूरत
- जिला अस्पतालों में पर्याप्त जीवन रक्षक उपकरण उपलŽब्ध हों।
-मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में आने वाले सभी गंभीर शिशुओं को
तत्काल वेंटिलेटर मिलें।
-बच्चों को अस्पताल में कतार से मु€क्ति मिले।
-अपॉइंटमेंट समय या अपॉइंटमेंट नंबर डिजिटल डिस्प्ले सिस्टम शुरू किया जाए।
-उपचार या जांच में एक से अधिक दिन की वेटिंग होने पर वैकल्पिक
व्यवस्था की जाए।

प्रदेश में सरकार किसी भी दल की रही हो, शिशुओं का स्वास्थ्य और उनकी मृत्यु दर हमेशा चिंता का विषय रही है। वर्ष 2017 में भी हाईकोर्ट ने पत्रिका की खबर पर स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लेकर शिशुओं की मौत के बारे में जानकारी मांगी थी। तब भी सरकार ने अधूरा सच ही हाईकोर्ट में बताया था और मात्र 17 हजार नवजातों की मौत की जानकारी दी थी। तब बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में अगस्त व सितंबर में 90 शिशुओं की मौत का मामला पत्रिका ने उठाया था। केन्द्र के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे के मुताबिक प्रदेश में आंकड़ा उस समय भी 70 हजार सालाना था, जो अब 60 हजार माना जा रहा है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/39zNiB6
via IFTTT

No comments: