Sunday, 21 October 2018

अपनों की बेकद्री का शिकार कमरे में कैद एक बेबस 'मां' की कहानी

उसकी ख्वाहिशें एक कमरे में कैद थी. भूख पड़ौसियों के रहम की मोहताज और जिंदगी अपनों की बेकद्री के आलम में मल मूत्र से सनी हुई. अंधेरे के साए में रोशनी तलाशता एक उम्रदराज जीवन. मंजर देखकर ही किसी का भी दिल पसीज जाए, नहीं पसीजा तो बस केवल अपनों का. कुछ ऐसी ही कहानी है एक मां की जो जयपुर में अपनों की बेकद्री का शिकार होकर घुट घुटकर जीवन जीने को मजबूर है. आंसू आंखों में ही जमकर गीड़ बन गए. हाथ पैर के नाखून तीन से चार इंच तक बढ़ गए. इन हालातों में जीवन जीने को मजबूर हो रही एक मां की दास्तां सुनकर आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे. देखिए ये विशेष रिपोर्ट.

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