जयपुर ।
चुनाव का ऐलान हो चुका है। जल्द ही प्रमुख राजनीतिक दल उम्मीदवारों की फेहरिस्त निकालेंगे। और फिर मतदाताओं को लुभाने के लिए जारी होंगे चुनाव घोषणा-पत्र। वादों की बकायदा लिस्ट जारी होगी। तारे जमीं पर लाने के दावे होंगे। हालात बदलने के वादे किए जाएंगे। लेकिन घोषणा पत्रों के वादों का आखिर अंजमा क्या होता है?
हाल ही सामने आया कि एक राजनीतिक दल की ओर से जब अपने घोषणा पत्र पर जनता से सुझाव मांगे गए तो जबाव आया 'पहले वाला कौनसा पूरा हो गया, जो नए में मांग पूरी कर देंगे?
बड़ा सवाल है कि मतदाताओं के इस अहम दस्तावेज के प्रति राजनीतिक दलों में सतही रवैया क्यों रहता है। व्यावहारिकता की कसौटी पर रख कर ये दस्तावेज तैयार कराए जाने चाहिए। घोषणा से पहले इनके क्रियान्वयन के लिए रोडमैप क्यों नहीं बनाया जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में घोषणा पत्रों पर अमल के बुरे हश्र के चलते जनता अब दलों पर अधिक भरोसा नहीं कर रही है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो घोषणा पत्रों के प्रति मतदाताओं में नाराजगी क्यो पनप रही है।
मांगी सलाह, जवाब मिला मजाक है
प्रदेश स्तर के एक कर्मचारी संगठन ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि एक राजनीतिक दल से फोन आया है कि घोषणा पत्र तैयार हो रहा है, कर्मचारियों के लिए क्या करना है। कुछ जुड़वाना हो तो बता सकते हैं। इस पोस्ट के जवाब में एक जने ने लिखा कि राजनीतिक दल मजाक कर रहे हैं। जबकि दूसरे ने लिखा रहने दो, अब भरोसो कोनी रह्यो। एक अन्य ने लिखा कि घोषणा पत्र का कोई मतलब नहीं है। पिछले घोषणा पत्र में वेतन विसंगति दूर करने की बात की थी, दूर की? ऊपर से वेतन काट लिया।
घोषणा पत्र समितियां
भाजपा : अध्यक्ष-राजेंद्र सिंह राठौड़, सदस्य-गुलाब चंद कटारिया, औंकार सिंह लखावत, अरुण चतुर्वेदी, राव राजेन्द्र सिंह और अर्जुनराम मेघवाल, कार्यालय प्रभारी बीरू सिंह राठौड़
कांग्रेस : अध्यक्ष-हरीश चौधरी, सह अध्यक्ष-रघुवीर मीणा, समन्वयक-मंजू मेघवाल, समन्वयक-शंकुतला रावत
विशेषज्ञों की बजाए जातिगत समीकरण
घोषणा पत्र बनाने के लिए गठित समितियों में विशेषज्ञों की बजाय पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और जातिगत समीकरण का ख्याल रखा जाता है। यह समितियां चुनाव की घोषणा होने के बाद ही बनाई जाती है। समितियों के पास न तो जनता का मन जानने का समय होता है और ना ही समूचे राज्य को लेकर फीडबैक होता है।
उपलब्ध संसाधनों की जानकारी नहीं
घोषणा पत्र को लागू करने के संसाधन और साधन की जानकारी दलों के नेताओं के पास नहीं होती। सरकार बनने के बाद दलों को घोषणा पत्र को लागू करवाने में खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कार्यकाल बीत जाता है और बेरोजगारी, कृषि, पानी, चिकित्सा, कर्मचारियों की समस्या जैसी थी, उससे बदतर होती चली जाती हैं।
दबाव में मान ली जाती है मांग
चुनाव के समय होने वाले आंदोलनों के चलते आंदोलनकारियों के दबाव में बिना किसी तर्क और योजना के उनकी मांगों को पूरा करने का वादा घोषणा पत्र में शामिल किया जाता है। सत्ता में आने पर पार्टियां इन घोषणाओं को पूरा ही नहीं कर पातीं।
चुनाव आयोग इसे कानूनी दस्तावेज माने
चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र को कानूनी दस्तावेज मानना चाहिए और इसमें किए वादों को लेकर एक्शन टेकन रिपोर्ट लेनी चाहिए। दरअसल अभी घोषणा पत्र में सिर्फ वोट लेने के लिए तात्कालिक घटनाएं और भावनाओं को ध्यान में रखकर घोषणा की जाती है। इसके अलावा पुराने घोषणा पत्रों को उलट-पुलट कर नया कर औपचारिकता पूरी कर देते हैं। इसमें ठोस योजनाएं शामिल नहीं की जाती। राजनीतिक दलों की समितियां निष्पक्ष विशेषज्ञों की बात सुनने को तैयार ही नहीं होती है।
सी.बी.यादव, सहा. प्रोफेसर राजस्थान विश्वविद्यालय
राज्य के वित्तीय हालात देखकर हो घोषणाएं
घोषणा पत्रों के लक्ष्य व्यवाहारिक हों। राजनीतिक दल राज्य के आर्थिक हालात देख कर घोषणाएं करें। हाल में मुफ्त बिजली की घोषणा की गई, यह ठीक नहीं। उपभोग करने पर भुगतान करना ही पड़ेगा। गरीब और आमजन के लिए पानी, चिकित्सा, शिक्षा के मुद्दों को घोषणा पत्र में अधिक तवज्जो मिलनी चाहिए। सभी को साथ लेकर चलने की बात होनी चाहिए।
इंद्रजीत खन्ना, पूर्व मुख्य सचिव, राजस्थान
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