जयपुर। क्या आज के कानून लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा करते हैं? क्या लिव इन रिलेशनशिप में रहने और संबंधों को तोडऩे के लिए कानून होना चाहिए? इस तरह के संबंध में रहने वालों से उत्पन्न संतान को क्या पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलने चाहिए?
आमजन सहित विभिन्न वर्गों से सुझाव मांगकर राज्य मानवाधिकार आयोग ने इन बिन्दुओं पर बहस छेड़ दी है। 15 मई तक सुझाव मांगे गए हैं। लिव इन रिलेशनशिप को लेकर पुलिस की ओर से गृह विभाग के जरिए आयोग में पक्ष रखा गया है। इसमें पुलिस ने ऐसे संबंधों के दौरान होने वाले विवादों के निर्णय के लिए कानून की आवश्यकता जाहिर की है। इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को पैतृक संपत्ति में अधिकारों की वकाल त की है।
साथ ही, पुलिस चाहती है कि लिव इन रिलेशनशिप में रहने वालों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए उनके अन्य किसी से होने जा रहे विवाह को रोका जाना चाहिए। ऐसे संबंधों के कोर्ट के जरिए ही विच्छेद होने व भरण-पोषण सहित अन्य विषयों पर कानूनी प्रावधान की भी आवश्यकता जताई गई है। इस रिलेशनशिप में रहने वालों के पंजीकरण व महिलाओं से घरेलू हिंसा के दायरे में लिव इन रिलेशनशिप वाली महिलाओं को भी शामिल करने का सुझाव भी पुलिस ने दिया है। आयोग ने पुलिस के इन सुझावों की सराहना की है, वहीं महिला अधिकारिता विभाग से भी सुझाव देने को कहा है।
आयोग करेगा इन बिन्दुओं पर विचार
लिव इन रिलेशनशिप से परिवार के अन्य सदस्यों पर क्या प्रभाव हो सकता है?
इन रिश्तों से सम्मानजनक सामाजिक जीवन पर कोई प्रभाव होता है या नहीं?
क्या इसके लिए कोई योग्यता या अयोग्यता होनी चाहिए?
क्या इनका भी पंजीकरण होना चाहिए?
क्या अलग होने का कारण बताया जाना चाहिए?
क्या लिव इन रिलेशनशिप में इकतरफा संबंध विच्छेद की अनुमति होनी चाहिए?
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