Sunday, 7 April 2019

भीलवाड़ा की एक गली जिसकी माटी का है सोने जैसा मोल


जसराज ओझा भीलवाड़ा. आपने जमीन से सोना-चांदी निकलने की बात तो सुनी होगी, लेकिन शहर में एक एेसी गली है जहां का कचरा व मिट्टी भी बेशकीमती है। सुनकर ताज्जुब होगा कि इस गली की मिट्टी व नालियों का कीचड़ निकालने के लिए भी बोली लगती है। यह काम जिसको हाथ लगता है, उनकी तो 'चांदीÓ हो जाती है। यह जगह है शहर का सर्राफा बाजार। यहां नालियों में व सड़कों पर गिरी मिट्टी को एकत्र कर कुछ लोग इसमें से सोना-चांदी तक निकाल लेते हैं। दरअसल, सुनार जब काम करते हैं, तो सोने-चांदी की घिसाई व कटाई के दौरान कण बिखर जाते हैं। ये कण बहुत बारीक होते हैं। एेसे में दुकानों की सफाई करते समय नालियों में तथा सड़कों पर बिखर जाते हैं। जेवरात बनाने वाले इस कचरे को एकत्र कर बेच देते हैं। इसके बावजूद सड़कों पर मिट्टी में सोने-चांदी के कण रह जाते हैं। शहर में नियारगर समाज के कुछ परिवार बरसों से इस मिट्टी को यहां से ले जाकर सोना-चांदी निकाल कर परिवार चलाते हैं। यह इनका पुश्तैनी धंधा है।

पहुंच जाते हैं सुबह पांच बजे
नियारगर समाज के लोग सुबह पांच बजे सर्राफा बाजार, सुनारों की गली में पहुंच जाते हैं। कई बार सफाईकर्मियों से पहले या रात में ही पहुंचकर दुकानों के बाहर से मिट्टी एकत्र करते हैं। कुछ लोग नालियों से कीचड़ निकाल इसे भी सुखा देते हैं। इसके बाद मिट्टी को कई बार पानी से धोते हैं। बार-बार धोने के बाद अंत में चांदी व सोने के कण बचते हैं। इस प्रक्रिया में तीन से चार दिन लगते हैं। चार दशक से यह काम कर रहे मोहम्मद अली ने बताया कि धातु के कणों को तेजाब की भट्टी में तपाकर सोने और चांदी की अलग-अलग डली बना लेते हैं।

दोबारा चक्की में पीसते हैं मिट्टी
भवानीनगर क्षेत्र में रहने वाले कई परिवार नियारगरी करते हैं। मिट्टी को धोकर सोने-चांदी निकालने के बाद भी कुछ अवशेष बचते हैं। एेसे में मिट्टी को चक्की में पिसवाकर फिर वही धोने की प्रक्रिया अपनाते हैं। इसमें अच्छी आय हो जाती है। बाजार में मिट्टी एकत्र करने के लिए दुकान से दुकान तक का इलाका नियारगर परिवारों ने बांट रखा है। शहर में करीब दो दर्जन नियारगर परिवार हैं।

परम्परागत व्यवसाय
शहर में नियारगर परिवार यह काम करते हैं। परिवार में युवा पीढ़ी को भी यह काम समझाया जा रहा है। ये लोग सोना-चांदी निकालकर वापस बेच देते हैं। इस काम में मेहनत बहुत है एेसे में परिवार में पिछली पीढ़ी के कुछ लोग इससे नहीं जुड़े हैं। हालांकि पुश्तैनी काम होने से वे इसे सीख जरूर रहे हैं।

कचरा देखकर बताते हैं राशि
सर्राफा व्यापारी जसवंत सोनी ने बताया कि नियारगर कचरा देखकर राशि बताते हैं। सामान्य दुकान पर सालभर का कचरा होता है, तो २५ से ३० हजार रुपए मिल जाते हैं। इसके बाद वे दुकान के बाहर की मिट्टी बुहारकर भी ले जाते हैं। इसका पैसा नहीं मिलता। कई बार तो एक से अधिक नियारगर होने पर दुकान के कचरे व मिट्टी की बोली भी लगती है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal http://bit.ly/2WRTfSy

No comments: