दुनिया भर में शायद कोटा ही ऐसी जगह होगी जहां रावण को जलाने के बजाय उसका वध किया जाता था। वक्त के साथ कोटा के शाही दशहरे मेले की परंपराओं में भी खासा बदलाव आया, लेकिन एक चीज जो नहीं बदली वह थी रावण के ज्ञान को सम्मान देने की परंपरा। जिसके चलते उसे आज भी रावण नहीं रावण जी कह कर बुलाया जाता है। ऐसे ही परंपराओं के तमाम बदलाव पर नजर डाली इतिहासकार फिरोज अहमद ने।
पूरी दुनिया रावण जलाती है, लेकिन कोटा में रावण का वध किया जाता था। वध से पहले हरकारा रावण को समर्पण के लिए मनाने जाता था, लेकिन तोपें चलाकर युद्ध की घोषणा होती थी। ये सब छोडि़ए रावण की विद्वता का ऐसा सम्मान था कि उसे रावणजी कहा जाता था। वध के लिए गढ़ से निकलने वाली सवारी राजसी ठाठ-बाट और परंपराओं की कहानी बताती थी। पर, आधुनिकता की दौड़ ने जड़ों से दूर कर दिया। नहीं तो मैसूर से ज्यादा भीड़ कोटा दशहरा देखने आती थी।
परंपराओं से कटा दशहरा
इतिहास तभी आकर्षक होता है जब उसका अनूठापन बरकरार रहे। करीब सवा सौ साल के सफर में दशहरा मेला काफी हद तक परंपराओं से कट गया है। कोटा में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के साथ मंदोदरी और खर-दूषण का वध होता था। दशहरा मैदान में इनके पक्के बुत बने थे। पंचमी के दिन से इन पर लकड़ी के सिर सजाते थे। पहले दिन रावण का मुंह लाल होता था और लोग उसे कंकड़ी मारते थे। मान्यता थी कि ऐसा करने से मुसीबतें दूर होती हैं। कंकड़ी आज भी मारी जाती है, लेकिन रावण को छोड़ बाकी बुत तोड़ दिए गए। दशहरा मेला में बड़ा आकर्षण १९६३ तक तोपों की गोलाबारी थी। नौ दुर्गा, नारायण बाण, नगीना, बलम देज, ढाई सेर, ऊंदरी-सुंदरी और सौ कंडे की नाल जैसी तोपें थीं।
खरीदारी हुई खत्म
दशहरा प्रजा की मदद के लिए भी मनाया जाता था। मेले में आने वाले दुकानदारों से कर वसूली नहीं होती थी। दाम कम होने से लोग दूर-दूर से लोग खरीदारी करने आते थे। टिपटा से दुकानें सजना शुरू हो जाती थीं। पशु बाजार में ग्रामीण पशुओं को अच्छे दामों पर बेचने और खरीदने के लिए आते थे। यदि पशु मेला दूर जाएगा तो ग्रामीणों का जुड़ाव कैसे रहेगा? एक कहावत आज भी है:- रावणजी को तीसरो, कोटा भरे नीसरो। यानि दशमी के तीन दिन बाद मेला खत्म होता था।
तो देश ही नहीं दुनिया में नाम होगा
कोटा मेला लोक संस्कृति को प्रोत्साहित करने का बड़ा मंच था। स्थानीय कलाकारों के साथ ही हरिवंश राय बच्चन जैसे कवि और हेमंत कुमार जैसे कलाकार यहां आते थे। लेकिन अब तो ऐसे लोगों को भी बुलाया जाता है जिन्हें परिवार के साथ सुनने जाना लोग पसंद नहीं करते। कई बार लगता है कला के कद्रदानों की जगह हुल्लड़बाजों ने ले ली है। परंपराओं को जीवित रखें तो मैसूर की तरह की कोटा मेला राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक ख्याति प्राप्त कर सकता है।
(जैसा कि इतिहासकार फिरोज अहमद ने संवाददाता विनीत सिंह को बताया)
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