Friday, 19 October 2018

GST और नोटबंदी ने हाथ से छीना काम, दिन की मजदूरी नहीं बनती

जयपुर ।

भीलवाड़ा को चंबल का पानी देने की मांग लंबे समय से चल रही थी और इसकी शुरूआत हो चुकी है। लेकिन, नोटबंदी और जीएसटी का असर भी टेक्सटाइल्स उद्योग पर दिखने लगा है। भीलवाड़ा जिले का शाहपुरा विधानसभा क्षेत्र ऐसा है जो किसी भी नेशनल हाइवे से नहीं जुड़ा। यूं कहें की नेशनल हाइवे से 100 किलोमीटर अंदर जाकर शाहपुरा आता है। इसका असर यह रहा कि यहां उद्योग कभी विकसित हुए ही नहीं। शाहपुरा बस स्टैंड पर एक दुकान में काम कर रहे पंकज से बात हुई तो कहा कि यहां उद्योग कैसे विकसित होंगे।

राजस्थान के पिछड़े इलाकों में है शाहपुरा। वोट बैंक की राजनीति में ही उलझा रहा है। हां यह जरूर है कि चुनाव नजदीक आ गए हैं तो पानी लाने के प्रयास तेज हुए और तीन माह पहले चंबल का पानी आने लगा है। लेकिन यह योजना किसकी है। यह भी किसी से छुपी नहीं है। विकास भी हुआ, लेकिन नेताओं के लिए कुछ कहेंगे तो उनको बुरा लग जाएगा। हमको कार्यकर्ता कम और किराएदार ज्यादा बोला जाता है। इस बार तो स्थानीय आए तो अच्छा है।

इसके बाद मैं भीलवाड़ा औद्योगिक क्षेत्र पहुंचा। वस्त्रनगरी है, लेकिन जो दिखा। वह उत्साह वर्धक नहीं था। औद्योगिक क्षेत्र में जो गहमा गहमी आठ-दस साल पहले दिखती थी, वह कहीं नजर नहीं आई। पूछने पर पता चला कि साहब कौन से जमाने में जी रहे हो यहां तो फैक्ट्रियां बंद होने के कगार पर हैं और कई तो बंद हो चुकी है। फेक्ट्री में काम करने वाले रामनारायण गुर्जर ने बताया कि नोटबंदी और जीएसटी का हवाला दे देकर नौकरियों से निकाला जा रहा है और असर यह है कि दिन की मजदूरी ही नहीं बनती।

पानी को लेकर यहां भी चर्चा हुई तो सामने आया कि अब 90 प्रतिशत क्षेत्र में चंबल का पानी मिलने लगा है और करीब एकसाल हो गया है। वैसे भीलवाड़ा शहर में इन दिनों सत्तारूढ़ दल के स्थानीय नेताओं पर भ्रष्टाचार को लेकर हुई कार्रवाई की चर्चा भी चारों तरफ है। एक के बाद एक आरोपों ने पूरे जिले में सनसनी मचा रखी है।

इसके बाद पहुंचा आसींद। आसींद के हालात पर चर्चा करने सबसे पहले मिले शक्ति सिंह। स्थानीय निवासी हैं और खेती करते हैं और परम्परागत खेती से हट कर खेती कर रहे हैं। शक्ति सिंह ने बताया कि इस साल बारिश कम हुई है। अकालग्रस्त हालातों पर सरकार को नजर रखनी चाहिए। धार्मिक नगरी है। लोग दिल्ली-गुजरात सब जगह से आते हैं, लेकिन परिवहन व्यवस्था की उपलब्धता की कमी है। हां एक बात और। रेल आने की घोषणाएं बार-बार हो रही है, लेकिन अभी तक तो ऐसा कुछ दिखा नहीं।



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