कोटा. नशा नाश की जड़ है। हर कोई इस बात को जानता है, लेकिन मानता कौन है। सरकार भी नशामुक्ति पर करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन यह कितना कारगर साबित हो रहा है यह भी किसी से छिपा नहीं है। लेकिन, बूंदी जिले के जजावर कस्बे के माताजी का झोपड़ा गांव की कहानी जरा अलग है। यहां नशामुक्ति के सरकारी कार्यक्रम कितने चले होंगे। सामाजिक संस्थाएं जागरूक करने पहुंची भी ना पहुंची। फिर भी इस गांव में न कोई नशा करता है न ही नशे की किसी चीज को छूता है। कारण...? यहां विराजमान देवी ने खुद गांव को नशामुक्त बना दिया। यहां के लोग तम्बाकू युक्त सामग्री को हाथ तक नहीं लगाते हैं।
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झैठाल माताजी के पुजारी (भोपा) ने बताया कि जजावर कस्बे का माताजी का झौंपड़ा गांव में 350 परिवारों की आबादी है। जहां कोई भी व्यक्ति नशा नहीं करता। यहां बीड़ी, सिगरेट ,जर्दा, हुक्का, अफीम, गांजा, चरस सहित घ्रुम्रपान से संबंधित काई भी सामग्री के हाथ तक नहीं लगाते। यहां तम्बाकूयुक्त सामग्री के हाथ लगाना भी पाप माना जाता है। इसके पीछे ग्रामीणों द्वारा झैठाल माता के प्रति आस्था होने का तर्क दिया जाता है।
ऐसे होती है मेहमान नवाजी
माताजी का झौंपड़ा गांव में ग्रामीण खुद नशे संबंधित साम्रगी का उपयोग नहीं करते लेकिन मेहमान नवाजी में भी कम नहीं है। कोई मेहमान आता है और वह इस तरह की सामग्री की आवश्यकता होती है तो उनके आग्रह पर गांव के बाहर स्थित दुकान से तम्बाकु युक्त सामग्री को पॉलीथिन की थैली में दुकानदार से बंधवाकर लाते है और घर छड़ी के सहारे वह थैली मेहमान को थमा देते हैं।
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पूर्वजों की मान्यता माता जी का श्राप
पूर्वजों की मान्यता के अनुसार तम्बाकुयक्त सामग्री का सेवन करना मतलब माताजी का श्राप मिलना है। किशनलाल भोंपा ने बताया कि यहां पूर्वजों के समय से ही तम्बाकुयुक्त सामग्री पर प्रतिबन्ध है। जिसे बाशिंदे आज तक निभा रहे हैं। वहीं, माधों लाल ने बताया कि यदि किसी ने तम्बाकू व धुम्रपान का सेवन किया तो उसे खमियाजा भुगतना पड़ा है। गांव में कोई भी दुकान पर जर्दा, गुटखा, बीड़ी, सिगरेट रखते और बेचते तक नहीं हैं।
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मंदिर का इतिहास
झैठाल माताजी का मंदिर का निर्माण सन् 1632 ई. में जजावर ठिकानेदार रघुवीर सिंह के समय में हुआ था। मूर्ति स्थापना के समय यहां मल सिहं व मल्लोप सिंह का शासन था। यहां के प्रथम पुजारी धुधा लाल थे। इनके वंशज (भोपा) आज भी झैठाल माताजी की पूजा- अर्चना करते हैं।
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