Saturday, 7 November 2020

ऐसे लेबल बाजार में तो मौत से कौन बचाएगा

भुवनेश पंड्या

उदयपुर. प्रदेश में नकली दवा माफिया बेखौफ है। वे धड़ल्ले से जगह-जगह नकली दवाइयों का जाल बिछाकर कमाई करते हैं। दूसरी ओर यदि नकली दवाओं के इक्का दुक्का मामले पकड़े भी जाते हैं तो इसकी रिपोर्ट वर्षों बाद संबंधित अधिकारी के पास पहुंचती है। ऐसे में दवा सेवन करने वाले व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाए तो इसकी रिपोर्ट से पुष्टि होना मुश्किल है। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि यहां औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला केवल जयपुर में ही है, जबकि तीन जिलों में प्रयोगशालाएं बनकर तैयार हो गई है, लेकिन सरकार इन्हें शुरू नहीं कर पा रही।

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इसलिए हो रही रिपोर्ट में देरी

प्रदेश में जरूरत के मुताबिक प्रयोगशालाएं नहीं होने से सैंपल ली गई दवा की रिपोर्ट दो या तीन वर्ष में मिल रही है। उदयपुर, जोधपुर और बीकानेर में प्रयोगशालाओं के भवन बनाकर तैयार हो गए है, लेकिन वर्तमान में सरकार उन्हें शुरू नहीं कर पाई है। सरकार पिछले वर्ष इन्हें शुरू करने का मन बना चुकी थी, लेकिन कोरोना की वजह से भी इसकी शुरुआत में देरी हो रही है। वर्तमान में जयपुर लैब में पांच हजार से अधिक नमूनों की जांच लम्बित है।
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सीएम ने पिछले कार्यकाल में की थी घोषणा
वर्ष 2012-13 मेंं नई औषधि परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित की जानी थी, लेकिन इसके सात-आठ वर्ष बाद भी ये स्थापित नहीं हो पाई है। कई वर्षों बाद इनके भवन बन गए, लेकिन अभी यहां पूरे उपकरण और स्टाफ नहीं लगाया गया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने पिछले कार्यकाल में 26 मार्च, 2012 के बजट भाषण में इन तीनों प्रयोगशालाओं को शुरू करने की घोषणा की थी, जो वर्ष 2020 तक शुरू नहीं हो पाई है। राजस्थान मेडिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड के माध्यम से उपकरणों की खरीद होनी थी तो उपकरणों की खरीद के लिए 1015 लाख और 671.05 लाख रुपए का बजट जारी किया गया था, वहीं जोधपुर व बीकानेर को 583 लाख का बजट दिया गया था। बाद में इसे संशोधित कर कुल 1485.79 लाख रुपए दिए गए। उदयपुर को 54.30 लाख का बजट मिला था।

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उदयपुर में पहले मिल चुकी है नकली दवा

उदयपुर में तय मापदंडों के विरुद्ध बिकने वाली दवाइयों के अब तक करीब 30 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। 26 मामले नकली या सब स्टेडर्ड दवाओं के हैं। गंभीर अवमानना पर सरकार इसके लिए स्वीकृति देती है। औषधि व प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 के तहत मामले जांचे जाते हैं। उदयपुर में 2017 में पीमोक्सीवी में निल कंटेट होने से इसे नकली माना गया था। यह एंटीबायटिक गोली है। वर्तमान में प्रत्येक औषधि नियंत्रण अधिकारी (डीसीओ) छह नमूने प्रतिमाह ले रहे हैं। यानी न्यूनतम 24 नमूने लिए जा रहे है।
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लगाए गए दो फार्मासिस्ट
औषधि नियंत्रण अधिकारी विशाल जैन ने बताया कि यहां दो फार्मासिस्ट लगाए गए हैं, परीक्षण के लिए उपकरण आने लगे हैं। नियमानुसार नमूने लिए जाते हैं, लेकिन रिपोर्ट देरी से आती है। जिसमें पांच या दस प्रतिशत या निल कंटेट आता है, वह नकली दवा है। लेबल के अनुसार सॉल्ट कंटेंट नहीं होना नकली है। कोई भी टेबलेट तय समय में घुलती नहीं है तो अमानक मानी जाती है। फिलहाल नमूने जांच के लिए जयपुर औषधि परीक्षण प्रयोगशाला भेजा जाता है।

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लैब तैयार, लेकिन शुरू नहीं

लैब बनकर तैयार हो गई है, लेकिन फिलहाल शुरू नहीं हुई है। प्रदेश मेंं अन्य दो लैब भी शुरू नहीं है। केवल जयपुर से ही जांच हो रही है, ऐसे में दो-दो वर्ष से नमूनों की जांच लम्बित है। अभी वर्ष 2018 की रिपोर्ट मिली है। औषधि नियंत्रक के यहां से स्टाफ लगाने के बाद ही इसे शुरू कर सकते हैं। कोरोना के कारण देरी हो गई है।
चेतन्य प्रकाश पंवार, सहायक औषधि नियंत्रक, उदयपुर



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